शनिवार व्रत कथा
👉 इस आर्टिकल में शनिवार के व्रत के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करने की कोशिश करेंगे। शनिवार व्रत की कथा क्या है। शनिवार व्रत के मंत्र क्या हैं । शनिवार व्रत की आरती क्या है। शनिवार व्रत के लाभ क्या हैं। शनिवार व्रत में क्या सावधानियां बरतनी चाहिए। शनिवार व्रत में क्या खाना चाहिए। शनिवार व्रत क्या नहीं खाना चाहिए। शनिवार व्रत में भगवान शनि देव को क्या चढ़ाना चाहिए। शनिवार व्रत का उद्यापन कैसे करें। शनि देव के दोष क्या है। शनि देव के दोषों से बचने के लिए क्या करना चाहिए आदि के बारे में संपूर्ण जानकारी प्रदान करने की कोशिश करेंगे। शनि देव को नौ का राजा कहा जाता है। भगवान भोलेनाथ ने शनि देव को न्याय के देवता की उपाधि दी है। शनि देव को बहुत जल्दी क्रोध आता है। इसी क्रोध की वजह से पिता सूर्य देव से नाराज़गी बनी रहती है। इनके क्रोध से सभी बचने की कोशिश करते हैं , वरना व्यक्ति पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है , इसलिए शनि देव को प्रसन्न करने के लिए शनिवार को व्रत रखा जाता है। व्यक्ति शनि दोष से बचाने और शनि देव को शांत रखने के लिए अनेक उपाय करता है। शनि कृपा से व्यक्ति को सुख और वैभव की प्राप्ति होती है। जो लोग शनिवार करते हैं ,उनको पूजा के समय शनिवार व्रत कथा का श्रवण करना चाहिए। 👉 शनिवार व्रत कथा ➡️ एक समय में स्वर्गलोक में सबसे बड़ा कौन के प्रश्न पर नौ ग्रहों में वाद-विवाद हो गया। यह विवाद इतना बढ़ा की आपस में भयंकर युद्ध की स्थिति बन गई। निर्णय के लिए सभी देवता देवराज इन्द्र के पास पहुंचे और बोले- हे देवराज, आपको निर्णय करना होगा कि हममें से सबसे बड़ा कौन है। देवताओं का प्रश्न सुन इन्द्र उलझन में पड़ गए, फिर उन्होंने सभी को पृथ्वीलोक में उज्जयिनी नगरी में राजा विक्रमादित्य के पास चलने का सुझाव दिया।
उज्जयिनी पहुंचकर जब देवताओं ने अपना प्रश्न राजा विक्रमादित्य से पूछा तो वह भी कुछ देर के लिए परेशान हो उठे क्योंकि सभी देवता अपनी-2 शक्तियों के कारण महान थे। किसी को भी छोटा या बड़ा कह देने से उनके क्रोध के प्रकोप से भयंकर हानि पहुंच सकती थी। अचानक राजा विक्रमादित्य को एक उपाय सूझा और उन्होंने विभिन्न धातुओं- सोना, चांदी, कांसा, तांबा, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक व लोहे के नौ आसन बनवाए। धातुओं के गुणों के अनुसार सभी आसनों को एक-दूसरे के पीछे रखवाकर उन्होंने सभी देवताओं को अपने-अपने सिंहासन पर बैठने को कहा।
देवताओं के बैठने के बाद राजा विक्रमादित्य ने कहा- आपका निर्णय तो स्वयं हो गया। जो सबसे पहले सिंहासन पर विराजमान है, वहीं सबसे बड़ा है। राजा विक्रमादित्य के निर्णय को सुनकर शनि देवता ने सबसे पीछे आसन पर बैठने के कारण अपने को छोटा जानकर क्रोधित होकर कहा- हे राजन, तुमने मुझे सबसे पीछे बैठाकर मेरा अपमान किया है। तुम मेरी शक्तियों से परिचित नहीं हो, मैं तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा। शनि देव ने कहा- सूर्य एक राशि पर एक महीने, चन्द्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीने, बुध और शुक्र एक महीने, वृहस्पति तेरह महीने रहते हैं, लेकिन मैं किसी भी राशि पर साढ़े सात वर्ष तक रहता हूं। बड़े-बड़े देवताओं को मैंने अपने प्रकोप से पीड़ित किया है अब तू भी मेरे प्रकोप से नहीं बचेगा। इसके बाद अन्य ग्रहों के देवता तो प्रसन्नता के साथ चले गए, परन्तु शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहां से विदा हुए।
विक्रमादित्य से बदला लेने के लिए एक दिन शनिदेव ने घोड़े के व्यापारी का रूप धारण किया और बहुत से घोड़ों के साथ उज्जयिनी नगरी पहुंचे। राजा विक्रमादित्य ने राज्य में किसी घोड़े के व्यापारी के आने का समाचार सुना तो अपने अश्वपाल को कुछ घोड़े खरीदने को भेजा। घोड़े बहुत कीमती थे। अश्वपाल ने जब वापस लौटकर इस बारे में राजा विक्रमादित्य को बताया तो वह खुद आकर एक सुन्दर और शक्तिशाली घोड़ा पसंद किया।
घोड़े की चाल देखने के लिए राजा जैसे ही उस घोड़े पर सवार हुए वह बिजली की गति से दौड़ पड़ा। तेजी से दौड़ता हुआ घोड़ा राजा को दूर एक जंगल में ले गया और फिर वहां राजा को गिराकर गायब हो गया। राजा अपने नगर लौटने के लिए जंगल में भटकने लगा पर उसे कोई रास्ता नहीं मिला। राजा को भूख प्यास लग आई। बहुत घूमने पर उसे एक चरवाहा मिला। राजा ने उससे पानी मांगा। पानी पीकर राजा ने उस चरवाहे को अपनी अंगूठी दे दी और उससे रास्ता पूछकर जंगल से निकलकर पास के नगर में चला गया।
नगर पहुंच कर राजा एक सेठ की दुकान पर बैठकर कुछ देर आराम किया। राजा के कुछ देर दुकान पर बैठने से सेठजी की बहुत बिक्री हुई। सेठ ने राजा को भाग्यवान समझा और उसे अपने घर भोजन पर ले गया। सेठ के घर में सोने का एक हार खूंटी पर लटका हुआ था। राजा को उस कमरे में छोड़कर सेठ कुछ देर के लिए बाहर चला गया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। राजा के देखते-देखते सोने के उस हार को खूंटी निगल गई। सेठ ने जब हार गायब देखा तो उसने चोरी का संदेह राजा पर किया और अपने नौकरों से कहा कि इस परदेशी को रस्सियों से बांधकर नगर के राजा के पास ले चलो। राजा ने विक्रमादित्य से हार के बारे में पूछा तो उसने बताया कि खूंटी ने हार को निगल लिया। इस पर राजा क्रोधित होकर चोरी करने के अपराध में विक्रमादित्य के हाथ-पांव काटने का आदेश दे दिया। सैनिकों ने राजा विक्रमादित्य के हाथ-पांव काट कर उसे सड़क पर छोड़ दिया।
कुछ दिन बाद एक तेली उसे उठाकर अपने घर ले गया और उसे कोल्हू पर बैठा दिया। राजा आवाज देकर बैलों को हांकता रहता। इस तरह तेली का बैल चलता रहा और राजा को भोजन मिलता रहा। शनि के प्रकोप की साढ़े साती पूरी होने पर वर्षा ऋतु प्रारंभ हुई। एक रात विक्रमादित्य मेघ मल्हार गा रहा था, तभी नगर की राजकुमारी मोहिनी रथ पर सवार उस घर के पास से गुजरी। उसने मल्हार सुना तो उसे अच्छा लगा और दासी को भेजकर गाने वाले को बुला लाने को कहा। दासी लौटकर राजकुमारी को अपंग राजा के बारे में सब कुछ बता दिया। राजकुमारी उसके मेघ मल्हार से बहुत मोहित हुई और सब कुछ जानते हुए भी उसने अपंग राजा से विवाह करने का निश्चय किया।
राजकुमारी ने अपने माता-पिता से जब यह बात कही तो वह हैरान रह गए। उन्होंने उसे बहुत समझाया पर राजकुमारी ने अपनी जिद नहीं छोड़ी और प्राण त्याग देने का निश्चय कर लिया। आखिरकार राजा-रानी को विवश होकर अपंग विक्रमादित्य से राजकुमारी का विवाह करना पड़ा। विवाह के बाद राजा विक्रमादित्य और राजकुमारी तेली के घर में रहने लगे। उसी रात स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा- राजा तुमने मेरा प्रकोप देख लिया। मैंने तुम्हें अपने अपमान का दंड दिया है। राजा ने शनिदेव से क्षमा करने को कहा और प्रार्थना की- हे शनिदेव, आपने जितना दुःख मुझे दिया है, अन्य किसी को न देना।
शनिदेव ने कहा- राजन, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूं ।जो कोई स्त्री-पुरुष मेरी पूजा करेगा, शनिवार को व्रत करके मेरी व्रतकथा सुनेगा, उसपर मेरी अनुकम्पा बनी रहेगी। प्रातःकाल राजा विक्रमादित्य की नींद खुली तो अपने हाथ-पांव देखकर राजा को बहुत ख़ुशी हुई। उसने मन ही मन शनिदेव को प्रणाम किया। राजकुमारी भी राजा के हाथ-पांव सलामत देखकर आश्चर्य में डूब गई। तब राजा विक्रमादित्य ने अपना परिचय देते हुए शनिदेव के प्रकोप की सारी कहानी सुनाई।
इधर सेठ को जब इस बात का पता चला तो दौड़ता हुआ तेली के घर पहुंचा और राजा के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा। राजा ने उसे क्षमा कर दिया क्योंकि यह सब तो शनिदेव के प्रकोप के कारण हुआ था। सेठ राजा को अपने घर ले गया और उसे भोजन कराया। भोजन करते समय वहां एक आश्चर्य घटना घटी। सबके देखते-देखते उस खूंटी ने हार उगल दिया। सेठजी ने अपनी बेटी का विवाह भी राजा के साथ कर दिया और बहुत से स्वर्ण-आभूषण, धन आदि देकर राजा को विदा किया।
राजा विक्रमादित्य राजकुमारी मोहिनी और सेठ की बेटी के साथ उज्जयिनी पहुंचे तो नगरवासियों ने हर्ष के साथ उनका स्वागत किया। अगले दिन राजा विक्रमादित्य ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि शनिदेव सब देवों में सर्वश्रेष्ठ हैं। प्रत्येक स्त्री-पुरुष शनिवार को उनका व्रत करें और व्रतकथा अवश्य सुनें। राजा विक्रमादित्य कि घोषणा से शनिदेव बहुत प्रसन्न हुए। शनिवार का व्रत करने और व्रत कथा सुनने के कारण सभी लोगों की मनोकामनाएं शनिदेव की अनुकम्पा से पूरी होने लगी। सभी लोग आनंदपूर्वक रहने लगे।
👉 शनिवार व्रत की विधि ➡️ 1. शनिवार के दिन सुबह जल्दी उठ जाएं। फिर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2. फिर लोहे से बनी शनि देव की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराया जाता है।
3. फिर शनि देव की लोहे से बनी मूर्ति को चावलों से बनाए चौबीस दल के कमल पर स्थापित करना है।
4. इसके बाद शनि देव के समक्ष धूप और अगरबत्ती जलाएं।
5. फिर शनि देव की प्रतिमा पर काले तिल और तेल चढ़ाएं। साथ ही काले वस्त्र अर्पित करें।
6. शनि देव के मंत्रों का जाप करें और शनि चालीसा पढ़ें।
7. शनि देव को सरसों के तेल में बनी पूड़ी और काले उड़द की दाल की खिचड़ी का भोग लगाएं।
8.शनि व्रत कथा पढ़ने के बाद शनि देव की आरती करें।
9. फिर पूजा के समय हुई गलतियों की क्षमा मांगे।
10. इसके बाद पीपल के पेड़ की जड़ में जल चढ़ाएं।
11. साथ ही पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाकर रखें।
12. इस व्रत में पूरे दिन अन्न ग्रहण नहीं किया जाता है। फिर शाम के समय उड़द की दाल की खिचड़ी खाकर व्रत खोला जाता है।
शुक्रवार के व्रत की संपूर्ण जानकारी जाने के लिए यहां क्लिक करें 👉 शनिवार के कितने व्रत करने चाहिए ➡️ शनिवार के कम से कम सात व्रत तो जरूर रखने चाहिए। इस व्रत के दौरान आपको शनि देवता की विधि विधान पूजा करनी होगी। सात व्रत पूरे होने के बाद व्रत का उद्यापन जरूर करें। 👉 शनिवार व्रत की पूजा सामग्री ➡️ 1.धूप
2. अगरबत्ती
3. स्वच्छ जल
4. पंचामृत
5. चावल
6. सरसों का तेल
7. सूती धागा
8. लोहे से निर्मित शनि देव की प्रतिमा
9. पूजा की थाल
10. काले तिल
11. फल
12. कलश
13. पुष्प
14. काला कपड़ा 👉 शनिवार व्रत के मंत्र ➡️ शनि का वैदिक मंत्र: ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।।
शनि का तांत्रिक मंत्र: ॐ शं शनैश्चराय नमः।।
शनि का बीज मंत्र: ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।। 👉 शनिवार व्रत की आरती ➡️ जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी ।
नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
क्रीट मुकुट शीश रजित दिपत है लिलारी ।
मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी ।
लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
देव दनुज ऋषि मुनि सुमरिन नर नारी ।
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥ 👉 शनिवार व्रत के लाभ ➡️ 1. कुंडली में शनि सातवें भाव या ग्यारहवें भाव में या शनि मकर, कुंभ और तुला में है तो कोई बात नहीं परंतु इसके अलावा किसी भाव में है तो शनिवार का उपवास करना चाहिए। इससे नीच का शनि पीड़ा नहीं देता है और लगातार उपवास करने से सभी तरह के पाप मिट जाते हैं। शनि यदि कुंडली में सूर्य या केतु के साथ स्थिति है तो भी आपको शनिवार के उपवास करना चाहिए। यदि आप बुरा कार्य और बुरे कर्म करते हैं और अब सुधरना चाहते हैं तो आपको शनिवार के उपाय के साथ ही शनिवार का व्रत रखना चाहिए।
2. शनि की साढ़ेसाती या ढैया चल रही है या किसी भी प्रकार से शनि नीच होकर पीड़ा दे रहा है तो शनिवार को छाया दान करना चाहिए। इससे लाभ मिलेगा।
3. माथे पर विभूति, भस्म या लाल चंदन लगाने से गुरु का साथ मिलता है तो शनि के अच्छे फल मिलना प्रारंभ हो जाते हैं। किसी भी कार्य में बाधा उत्पन्न नहीं होती है। सफलता मिलती रहती है।
4. कुंडली में पितृदोष हो तो नित्य हनुमान चालीसा पढ़ें और शनिवार के दिन शनिवार का उपवास रखते हुए सुंदरकांड या बजरंगबाण का पाठ करने से लाभ मिलेगा। यदि आप जीवन में किसी तरह से भी मृत्यु तुल्य कष्ट नहीं चाहते हैं तो शनिवार को हनुमान आराधना जरूर करें।
5.शमी के वृक्ष को साक्षात शनिदेव माना जाता है। इस पेड़ में जल चढ़ाना या इसकी देखरेख करने से भगवान शनिदेव की कृपा बनी रहती है।
👉 शनिवार व्रत में क्या खाना चाहिए ➡️ 1. सुबह का भोजन :- शनिवार सुबह जल्दी उठकर नहाने से पहले आपको कुछ भी मुंह में नहीं डालना चाहिए। स्नान आदि के बाद आप चाय कॉफी आदि ले सकते हैं। याद रहें अगर आप चाय कॉफी नहीं पीते हैं तो सादा सफेद दूध ना लें। शनिवार व्रत में सफेद खाने की वस्तुओं का उपयोग नहीं किया जाता है। दूध में गुड़,हल्दी या केसर डालकर लें जिससे उसका रंग सफेद ना रहे।
2. फलाहार :- सुबह चाय कॉफी लेने के बाद जब 10, 11 बजे तक आपके थोड़ी भूख महसूस हो तो आप फलों का सेवन कर सकते हैं। चूंकि शनिदेव को काले रंग की वस्तुएं बहुत पसंद हैं इसलिए शनिवार व्रत में काले रंग के फल ही ज्यादा खाए जाते हैं। काले फलों में काले अंगूर, काले जामुन आदि खा सकते हैं। इसके अलावा केला, आम आदि मीठे फलों का सेवन भी कर सकते हैं।
3. मखाने/साबूदाना :- फलाहार करने के बाद दोपहर में 2,3 बजे जब दुबारा थोड़ी भूख महसूस हो तो आप साबूदाना की खिचड़ी, मखाने आदि खा सकते हैं।
4. शाम की चाय :- दोपहर के बाद शाम को 4,5 बजे चाय के साथ भी आप थोड़े मखाने, मुरमुरे आदि खा सकते हैं। शाम के चाय के बाद हो सकते तो कुछ ना खाएं। शाम को शनिदेव की पूजा अर्चना करने के बाद भी भोजन करें।
5. शाम का भोजन :– शाम को शनिदेव की पूजा अर्चना करके आप भोजन कर सकते हैं। यह भोजन मीठा और बिना नमक का लिया जाता है। भगवान शनि के काले रंग के प्रेम के कारण भोजन भी काले रंग का बनाया जाता है। शनिवार के व्रत में शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाया जाता है इसलिए इस दिन सरसों के तेल से भोजन नहीं बनाया जाता। घी में भोजन बनाए तो बहुत उत्तम रहेगा। नीचे दिए गए व्यंजन आप आसानी से घर पर शनिवार व्रत में बना सकते हैं।
गुलाब जामुन
काली उड़द की दाल की खिचड़ी।
काले चने की सब्जी।
काले तिलों से बने व्यंजन।
राजमा ।
कुटु के आटे की रोटी, पराठा,पकोड़ी आदि।
सिंघाड़े का हलवा और मीठी पूड़ी। 👉 शनिवार व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए ➡️ 1. जो व्यक्ति शनिवार के दिन मीट, मछली जैसे मासांहारी भोजन करते हैं उन्हें शनि ग्रह का नकरात्मक प्रभाव झेलना पड़ता है, क्योंकि शनि एक क्रूर ग्रह है और तामसिक भोजन ग्रह के प्रभाव को भड़काने का काम करते हैं।
2. मदिरा का सेवन भी अशुभ माना जाता है। शनिवार के दिन शराब पीने एवं सिगरेट पीने आदि से भी शनि देव नाराज हो जाते हैं, क्योंकि इन चीजों को राक्षसों का पेय पदार्थ माना जाता है और मदिरा का सेवन करने से व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। ऐसे में वो लोगों से दुव्र्यवहार करता है। जिससे शनि देव क्रोधित हो जाते हैं। 3. शनिवार के दिन मसूर की दाल का भी उपयोग नहीं करना चाहिए। क्योंकि मसूर की दाल लाल रंग की होती है और लाल रंग मंगल ग्रह का प्रतीक होता है। शनिवार को इसका सेवन करने से मंगल और शनि दोनों का ही आपस में टकराव होता हैै। 4. चूंकि मंगल और शनि दोनों ही क्रूर ग्रह हैं इसलिए मसूर की दाल खाने से व्यक्ति का गुस्सा बढ़ता है। इससे व्यक्ति अपने मस्तिष्क पर काबू नहीं कर पाता है, जिससे लड़ाई-झगड़ा एवं विवाद होने का खतरा रहता है। 5. शनिवार को दूध भी नहीं पीना चाहिए, क्योंकि दूध का सफेद रंग शुक्रवार का प्रतीक होता है और शनि एवं शुक्र ग्रह एक-दूसरे के विरोधी होते हैं। यदि शनिवार को सादे दूध का सेवन किया जाए तो व्यक्ति की काम इच्छा जाग जाती है। इससे कई बार वो अपने स्वभाव के विपरीत कार्य करने लगता है। जिससे शनिदेव नाराज हो जाते हैं। इससे बचने के लिए दूध में गुड़ व केसर मिलाकर पिएं। 6. शनिवार के दिन लाल मिर्च खाने से भी बचना चाहिए। क्योंकि ये भी मंगल ग्रह को दर्शाता है। जबकि शनि देव इसके विरोधी हैं। उन्हें तीखे की जगह नमकीन और मीठा पसंद है। इसलिए शनिवार को लाल मिर्च खाने से व्यक्ति के मन में द्वेष भावना बढ़ती है और वो लोगों को भला—बुरा बोलने लगता है। 7. शनिवार को अचार या खट्टी चीजें भी नहीं खानी चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति का स्वास्थ प्रभावित हो सकता है। इससे उसे पेट में जलन, पेट फूलना एवं एसिडिटी जैसी परेशानियां हो सकती हैं। 8. शनिवार के दिन व्यक्ति को सादा दही भी नहीं खाना चाहिए। क्योंकि इसे भी शुक्र ग्रह से संबंधित माना जाता है। इसके सेवन से व्यक्ति का दिमाग स्थिर नहीं रहता है। वो चीजों को पाने के लिए भागने लगता है। इससे कई बार उसे नुकसान भी झेलना पड़ सकता है। 9. शनिवार के दिन नमक का भी प्रयोग कम किया जाना चाहिए। यदि संभव हो तो इसे शनिवार को नहीं खाना चाहिए। क्योंकि इसके प्रयोग से व्यक्ति पर कर्ज का बोझ पड़ सकता है। साथ ही अनावश्यक धन खर्च हो सकता है। 👉 शनिवार व्रत में भगवान शनि देव को क्या चढ़ाना चाहिए ➡️ पूजा के समय शनि महाराज को शमी के पत्ते, शमी के फूल, जड़ और उसका फल चढ़ाया जाता है। इससे शनि देव का आशीर्वाद मिलता है, दुख दूर होते हैं और धन संकट भी खत्म होता है। शमी के पौधे को जल चढ़ाने और उसके नीचे सरसों का दीपक जलाने से शनि देव खुश होते हैं। शनिवार के दिन आप अपने घर पर शमी का पौधा लगा सकते हैं। 👉 शनिवार व्रतों का उद्यापन कैसे करना चाहिए ➡️ शनिवार व्रत उद्यापन 17, 27, 37, 57 शनिवार व्रत रखने के बाद करना चाहिए।
आपने जितने शनिवार तक का व्रत संकल्प लिया हो उतने के बाद भी कर सकते हैं।
जिस शनिवार को व्रत का संकल्प पूरा हो रहा हो उसके अगले शनिवार (शनिवार के उपाय) पूजा करें।
सुबह जल्दी उठकर नहाने के पानी में काले तिल या गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
शनि देव का ध्यान कर 'ॐ प्राम प्रीम प्रौम सः शनैश्चराय नमः' मंत्र का जाप करें। 👉 शनि देव के दोष क्या है ➡️
1. कुंडली में शनि की खराब स्थिति हो तो व्यक्ति हमेशा सोच में डूबा रहता है।ऐसे लोग खुद से ही बातें करते हैं।
2. शनि की अशुभ स्थिति होने पर व्यक्ति मांगलिक कार्यों में हिस्सा नहीं लेता है।
3. शनि के दुष्प्रभाव से इन लोगों के सिर हर हमेशा गुस्सा सवार रहता है। शनि दोष के प्रभाव से इन लोगों का कोई भी काम आसानी से नहीं होता है।
4. शनि जब श्राप के रूप में किसी पर सवार होते है तो वे उसकी बुद्धि नष्ट कर देते हैं। इससे घर में लड़ाई-झगड़े और बीमारियां होने लगती हैं। कुंडली में शनि दोष हो तो शनि ग्रह शांति के लिए उपाय करना चाहिए। 👉 शनिवार दोषों के उपाय क्या हैं ➡️ 1. शनि ग्रह शांति के लिए कई उपाय किये जाते हैं. इनमें शनिवार का व्रत, हनुमान जी की आराधना, शनि मंत्र, शनि यंत्र, छायापात्र दान करना प्रमुख उपाय हैं।
2. शनि कर्म भाव का स्वामी है इसलिए शनि के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए।
3. एक काजल की डिब्बी लीजिए और भोलेनाथ का नाम लेते हुए शनि दोष से पीड़ित व्यक्ति के ऊपर से 21 बार इस डिब्बी को उतार लीजिए। अब एकांत में जाकर किसी पेड़ के नीचे एक छोटा गड्ढा खोद कर उसे दबा दीजिए। इससे शनि की कुद्रष्टि दूर होती है।
4. शनि देव की कृपा प्राप्त करने के लिए मजदूरों की सेवा करना और उन्हें खाने-पीने का सामान देना उत्तम होता है। कुत्तों और कौओं की सेवा करने से शनि देव का दुष्प्रभाव कम होता है।
5. हर शनिवार के दिन एक लोहे के कटोरे में साबुत उड़द, काले चने और सरसों का तेल मिलाकर एक साथ डाल दें। अब इसे कपड़े में लपेटकर उस पर वह कटोरा रख दें और अपने माथे पर लगा कर इसे दान देना शुरू करें। इससे शनि दोष कम होता है।
6. शनि दोष से छुटकारा पाने के लिए हर दिन सुबह उठ कर स्नान करें और हनुमान चालीसा का पाठ करें। थोड़े से जल में दूध और दो दाने चीनी के डालकर बड़ के पेड़ पर चढ़ाकर गीली मिट्टी का तिलक लगाएं। इससे शनि की कृपा मिलती है। नोट इस आर्टिकल में निहित किसी भी जानकारी , सामग्री , गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों , ज्योतिषियों , पंचांग , प्रवचनों , मान्यताओं , धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी। ✍️ मंजीत सनसनवाल 🤔