देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत की संपूर्ण जानकारी
👉 सभी एकादशियों में देव प्रबोधिनी एकादशी उठनी एकादशी का विशेष महत्व होता है। यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है। वहीं आपको बता दें कि देव उठनी एकादशी को देव प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। हर साल ये पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। इस आर्टिकल में देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत की संपूर्ण जानकारी मिलेगी। देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत की कथा क्या है। देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि क्या है। देव प्रबोधिनी एकादशी के कितने व्रत रखने चाहिए। देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत 2025 में कब है । देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत में क्या सावधानियां बरतनी चाहिए। देव प्रबोधिनी एकादशी में कौन - से मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए। देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत में कौन - सी आरती करनी चाहिए। देव प्रबोधिनी व्रत में क्या खाना चाहिए। देव प्रबोधिनी एकादशी क्या नहीं खाना चाहिए। देव प्रबोधिनी एकादशी के व्रत रखने के क्या लाभ होते हैं। देव प्रबोधिनी एकादशी व्रतों का उद्यापन कैसे करना चाहिए आदि की संपूर्ण जानकारी होना जरूरी है। इन सभी विधि विधान से देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत रखने पर संपूर्ण माना जाता है। तो देव प्रबोधिनी एकादशी की सभी जानकारी इस प्रकार है ।
कामदार व्रत की संपूर्ण जानकारी
1. देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत की कथा ➡️
ब्रह्माजी बोले - हे मुनि श्रेष्ठ ! अब पापों को हरनेवाली पुण्य और मुक्ति देने वाली एकादशी का माहात्म्य सुनिए। पृथ्वी पर गंगा की महत्ता और समुद्रों तथा तीर्थों का प्रभाव तभी तक है जब तक कि कार्तिक की देव प्रबोधिनी एकादशी तिथि नहीं आती। मनुष्य को जो फल एक हजार अश्वमेध और एक सौ राजसूय यज्ञों से मिलता है वही प्रबोधिनी एकादशी से मिलता है। नारदजी कहने लगे कि हे पिता! एक समय भोजन करने , रात्रि को भोजन करने तथा सारे दिन उपवास करने से क्या फल मिलता है सो विस्तार से बताइए। ब्रह्माजी बोले हे - हे पुत्र ! एक बार भोजन से एक जन्म और रात्रि को भोजन करने से दो जन्म तथा पूरा दिन उपवास करने से सात जन्मों के पापों का नाश होता है। जो वस्तु त्रिलोकी में न मिल सके और दिखे भी नहीं वह हरि प्रबोधिनी एकादशी से प्राप्त हो सकती है। मेरु और मंदराचल के समान भारी पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा अनेक जन्म में किए हुए पाप समूह क्षणभर में भस्म हो जाते हैं।
जैसे रुई के बड़े ढेर को अग्नि की छोटी - सी चिंगारी पलभर में भस्म कर देती है। विधि पूर्वक थोड़ा सा पुण्य कर्म बहुत फल देता है। परंतु विधि रहित अधिक किया जाए तो भी उसका फल कुछ नहीं मिलता। संध्या न करने वाले, नास्तिक, वेद निंदक, धर्मशास्त्र को दूषित करने वाले, पापकर्मों में सदैव रत रहने वाले, धोखा देने वाले ब्राह्मण और शूद्र, परस्त्री गमन करने वाले तथा ब्राह्मणी से भोग करने वाले ये सब चांडाल के समान हैं। जो विधवा अथवा सधवा ब्राह्मणी से भोग करते हैं, वे अपने कुल को नष्ट कर देते हैं।
परस्त्री गामी के संतान नहीं होती है और उसके पूर्व जन्म के संचित सब अच्छे कर्म नष्ट हो जाते हैं। जो गुरु ब्रह्राणों से अहंकारयुक्त बात करता है यह भी धन और संतान से हीन होता है। भ्रष्टाचार करने वाला, चांडाली से भोग करने वाला, दुष्ट की सेवा करने वाला और जो नीच मनुष्य की सेवा करते हैं या संगति करते हैं, ये सब पाप हरि प्रबोधिनी एकादशी के व्रत से नष्ट हो जाते हैं।
जो मनुष्य देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत को करने का संकल्प मात्र करते हैं उनके सौ जन्मों के पास नष्ट हो जाते हैं । जो इस दिन रात्रि जागरण जागरण करते हैं उनकी आने वाली दस हजार पीढि़याँ स्वर्ग को जाती हैं। नरक के दु:खों से छूटकर प्रसन्नता के साथ सुसज्जित होकर वे विष्णुलोक को जाते हैं। ब्रह्महत्यादि महान पाप भी इस व्रत के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं। जो फल समस्त तीर्थों में स्नान करने, गौ, स्वर्ण और भूमि का दान करने से होता है, वही फल इस एकादशी की रात्रि को जागरण से मिलता है।
हे मुनिशार्दूल ! इस संसार में उसी मनुष्य का जीवन सफल है जिसने हरि प्रबोधिनी एकादशी का व्रत किया है। वहीं ज्ञानी तपस्वी और जितेंद्रीय है तथा उसकी को भोग एवं मोक्ष मिलता है जिसने इस एकादशी का व्रत किया है। वह विष्णु को अत्यंत प्रिय, मोक्ष के द्वार को बताने वाली और उसके तत्व का ज्ञान देने वाली है। मन, कर्म, वचन तीनों प्रकार के पाप इस रात्रि को जागरण से नष्ट हो जाते हैं।
इस दिन जो मनुष्य भगवान की प्रसन्नता के लिए स्नान , दान ,तप और यज्ञादि करते हैं , वे अक्षण पुण्य को प्राप्त होते हैं। प्रबोधिनी एकादशी के दिन व्रत करने से मनुष्य के बाल, यौवन और वृद्धावस्था में किए समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन रात्रि जागरण का फल चंद्र, सूर्य ग्रहण के समय स्नान करने से हजार गुना अधिक होता है। अन्य कोई पुण्य इसके आगे व्यर्थ हैं। जो मनुष्य इस व्रत को नहीं करते उनके अन्य पुण्य भी व्यर्थ ही हैं।
अतः हे नारद ! तुम्हें भी विधिपूर्वक इस व्रत विधि पूर्वक करना चाहिए। जो कार्तिक मास में धर्मपारायण होकर अन्न ही खाते उन्हें चांद्रायण व्रत का फल प्राप्त होता है। इस मास में भगवान दानादि से जितने प्रसन्न नहीं होते जितने शास्त्रों में लिखी कथाओं के सुनने से होते हैं। कार्तिक मास में जो भगवान विष्णु की कथा का एक या आधा श्लोक भी पढ़ते, सुनने या सुनाते हैं उनको भी एक सौ गायों के दान के बराबर फल मिलता है। अत: अन्य सब कर्मों को छोड़कर कार्तिक मास में मेरे सन्मुख बैठकर कथा पढ़नी या सुननी चाहिए।
जो कल्याण के लिए इस मास में हरी मास कथा कहते हैं वे सारे कुटुम्ब का क्षण मात्र में उद्धार कर देते हैं। शास्त्रों की कथा कहने - सुनने से दस हजार यज्ञों का फल मिलता है। जो नियमपूर्वक हरि कथा सुनते हैं वे एक हजार गोदान का फल पाते हैं। विष्णु के जागने के समय जो भगवान की कथा सुनते हैं वे सातों द्वीपों समेत पृथ्वी के दान करने का फल पाते हैं। कथा सुनकर वाचक को जो मनुष्य सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देते हैं उनको सनातन लोक मिलता है।
प्राचीन काल में एक राजा थे जिनके राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे। राजा से लेकर प्रजा तक, और यहां तक कि पशु-पक्षी भी इस दिन अन्न ग्रहण नहीं करते थे। एक बार भगवान विष्णु ने राजा की परीक्षा लेने का विचार किया।
वे एक सुंदर स्त्री का रूप धारण करके सड़क के किनारे बैठ गए। राजा उस रास्ते से गुजर रहे थे तो उन्होंने उस सुंदर स्त्री को देखा। राजा ने उससे पूछा कि तुम कौन हो और यहां क्यों बैठी हो?
स्त्री ने कहा कि वह बेसहारा है और उसका कोई नहीं है। राजा उस स्त्री के सौंदर्य पर मोहित हो गए और उन्होंने उससे कहा कि तुम मेरे साथ रानी बनकर महल में चलो। स्त्री ने राजा के सामने एक शर्त रखी कि वह तभी उनके साथ जाएगी जब राजा उसे राज्य का आधा हिस्सा देंगे और उसके द्वारा बनाए गए भोजन को ही खाएंगे।
राजा ने स्त्री की शर्त मान ली और उसे महल में ले गए। कुछ दिन बाद राजा ने उस स्त्री को राज्य का आधा हिस्सा दे दिया। अब वह स्त्री राजा के साथ बैठकर भोजन करती थी।
एक दिन राजा ने उस स्त्री से पूछा कि तुम क्या भोजन बनाती हो? स्त्री ने कहा कि मैं वही भोजन बनाती हूं जो आप खाते हैं। राजा ने कहा कि मैं तो एकादशी का व्रत रखता हूं और उस दिन अन्न नहीं खाता।
स्त्री ने कहा कि मैं भी एकादशी का व्रत रखती हूं , लेकिन मैं अन्न खाती हूं। राजा ने कहा कि यह कैसे हो सकता है? स्त्री ने कहा कि आप मेरी बात नहीं समझेंगे।
राजा ने बहुत आग्रह किया तो स्त्री ने कहा कि मैं अगले एकादशी के दिन आपको सब कुछ बता दूंगी। जब एकादशी का दिन आया तो स्त्री ने राजा से कहा कि आज मैं आपको एक ऐसा भोजन बना कर खिलाऊंगी जिससे आपका व्रत भी नहीं टूटेगा और आप का पेट भी भर जाएगा।
राजा ने कहा कि ठीक है। स्त्री ने राजा को एक ऐसा भोजन बना कर खिलाया जो देखने में तो अन्न जैसा था, लेकिन वास्तव में वह फल था। राजा ने वह भोजन खा लिया और उनका व्रत भी नहीं टूटा।
जब राजा को यह बात समझ में आ गई तो उन्होंने उस स्त्री से कहा कि तुम वास्तव में कौन हो? स्त्री ने अपना असली रूप धारण कर लिया। राजा ने देखा कि वह भगवान विष्णु हैं।
राजा ने भगवान विष्णु से क्षमा मांगी और कहा कि मैंने आपको पहचाना नहीं। भगवान विष्णु ने कहा कि मैंने तुम्हें इसलिए परीक्षा में डाला था कि तुम यह जान सको कि व्रत का महत्व क्या होता है।
राजा ने भगवान विष्णु से कहा कि अब मैं समझ गया हूं कि व्रत का महत्व क्या होता है। मैं अब से हमेशा एकादशी का व्रत रखुगां।
इस प्रकार, देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत कथा हमें यह शिक्षा देती है कि हमें हमेशा व्रत का पालन करना चाहिए और भगवान विष्णु पर विश्वास रखना चाहिए।
2.देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि ➡️
देव प्रबोधिनी एकादशी का व्रत बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की निद्रा से जागते हैं और सृष्टि का संचालन पुनः शुरू करते हैं। इस एकादशी को देव उठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा अर्चना की जाती है।
पूजा विधि इस प्रकार है:-
1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करें: सबसे पहले सुबह उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें।
2. घर के मंदिर को साफ करें: घर के मंदिर को साफ करें और भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें।
3. व्रत का संकल्प लें: व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु का ध्यान करें।
4. भगवान विष्णु को स्नान कराएं: भगवान विष्णु को गंगाजल से स्नान कराएं।
5. नए वस्त्र अर्पित करें: भगवान विष्णु को नए वस्त्र अर्पित करें।
6. फूल और तुलसी दल अर्पित करें: भगवान विष्णु को फूल और तुलसी दल अर्पित करें।
7. दीप और धूप जलाएं: दीप और धूप जलाकर भगवान विष्णु की आरती करें।
8. भोग लगाएं: भगवान विष्णु को फल, मिठाई और पंचामृत का भोग लगाएं।
9. मंत्र जाप करें: भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। आप "ओम नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप कर सकते हैं।
10 कथा पढ़ें: देव प्रबोधिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें।
11. ब्राह्मणों को दान दें: ब्राह्मणों को दान दें और उन्हें भोजन कराएं।
12. रात्रि जागरण करें: रात्रि जागरण करें और भगवान विष्णु के भजनों का गायन करें।
विशेष:-
1. इस दिन तुलसी विवाह का भी आयोजन किया जाता है। तुलसी के पौधे को दुल्हन की तरह सजाकर भगवान विष्णु के साथ उनका विवाह कराया जाता है।
2. इस दिन भगवान विष्णु को गन्ना, सिंघाड़ा, शकरकंद और फल आदि अर्पित किए जाते हैं।
3. इस दिन अन्न का त्याग करें और केवल फल और दूध का सेवन करें।
4. इस दिन झूठ न बोलें और किसी से भी कठोर वचन न बोलें।
5. इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करें।
इस प्रकार देव प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
3.देव प्रबोधिनी एकादशी के कितने व्रत करने चाहिए ➡️
देव प्रबोधिनी एकादशी का व्रत एक ही दिन किया जाता है। यह व्रत कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की निद्रा से जागते हैं और इसीलिए इस एकादशी का विशेष महत्व है।
4.देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत 2025 में कब है ➡️
देव प्रबोधिनी एकादशी, जिसे देव उठनी एकादशी या देवोत्थान एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है।
2025 में देव प्रबोधिनी एकादशी 1 नवम्बर, शनिवार को मनाई जाएगी।
यह एकादशी दिवाली के बाद आती है और इस दिन भगवान विष्णु चार महीने के विश्राम के बाद जागते हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से सभी पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है।
5.देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत में क्या सावधानियां बरतनी चाहिए ➡️
देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है, जिसे बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस व्रत को करने के कुछ नियम और सावधानियां हैं जिनका पालन करना आवश्यक है।
1.एकादशी के दिन क्या खाएं और क्या नहीं:-
1. इस दिन अन्न का सेवन नहीं किया जाता है।
2. आप फल, दूध, दही, और सूखे मेवे जैसे फलाहार का सेवन कर सकते हैं।
3. कुछ लोग इस दिन निर्जला व्रत भी रखते हैं, यानी बिना पानी के व्रत।
2. व्रत कैसे शुरू करें और कैसे तोड़ें:-
19 एकादशी के एक दिन पहले से ही सात्विक भोजन ग्रहण एकादशी के दिन क्या खाएं और क्या नहीं: करें।
2. दशमी के दिन रात में भोजन करने के बाद, अगले दिन सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
3. द्वादशी के दिन स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और फिर व्रत तोड़ें।
3. क्या करें और क्या न करें:-
1. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और तुलसी की पूजा विशेष रूप से की जाती है।
1.विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना शुभ माना जाता है।
1. इस दिन दान-पुण्य करना भी महत्वपूर्ण है।
2. व्रत के दौरान झूठ नहीं बोलना चाहिए और न ही किसी को बुरा-भला कहना चाहिए।
3. स्वास्थ्य संबंधी सावधानियां:
4. यदि आप पहली बार व्रत रख रहे हैं या किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं, तो डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
5. गर्भवती महिलाओं और बच्चों को निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए।
6. व्रत के दौरान यदि कोई स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो, तो व्रत तोड़ देना चाहिए।
देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत एक पवित्र और महत्वपूर्ण व्रत है। इन सावधानियों का पालन करके आप इस व्रत को सफलतापूर्वक कर सकते हैं और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।
6.देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत में कौन - से मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए ➡️
देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को निद्रा से जगाने के लिए कुछ खास मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इन मंत्रों के जाप से भगवान विष्णु प्रसन्न होते है और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
यहां कुछ प्रमुख मंत्र दिए गए हैं:-
1. " उतिष्ठोतिष्ठ गोविन्द त्यज निंद्रा जगत्पते ।
यह मंत्र भगवान विष्णु को निद्रा से जगाने का सबसे प्रसिद्ध मंत्र है। इसका अर्थ है, "हे गोविंद, उठो, उठो, हे जगत के स्वामी, निद्रा का त्याग करो। तुम्हारे सोने पर यह सारा जगत सो जाता है।"
2." त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम ।
उत्यिते चेषटते सर्वमुतिष्ठोतिष्ठ माधवे।। "
यह मंत्र भी भगवान विष्णु को जगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसका अर्थ है, "तुम्हारे सोने पर यह सारा जगत सो जाता है। तुम्हारे उठने पर ही सब कुछ चेतना में आता है। हे माधव, उठो, उठो।"
3. " विश्ववाधांर गगनसदृंश मेघवर्ण शुभाङृम।
लक्ष्मीकांत कमलनयंन योगिभिध्यारनगम्यम।।"
यह मंत्र भगवान विष्णु के रूप का वर्णन करता है। इसका अर्थ है, "जो विश्व के आधार हैं, आकाश के समान विशाल हैं, मेघ के समान रंग वाले हैं, जिनके अंग सुंदर हैं, जो लक्ष्मी के पति हैं, जिनके कमल के समान नेत्र हैं, जो योगियों के ध्यान से प्राप्त होते हैं।"
इन मंत्रों के अलावा, आप अपनी श्रद्धा और भक्ति के अनुसार अन्य मंत्रों का जाप भी कर सकते हैं।
देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन मंत्रों का जाप करने के साथ-साथ भगवान विष्णु की पूजा भी करनी चाहिए। इस दिन व्रत रखने और दान करने का भी विशेष महत्व है।
7. देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत में कौन - सी आरती करनी चाहिए ➡️
देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता तुलसी की पूजा की जाती है। इस दिन उनकी आरती करने का भी विशेष महत्व है।
देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन आप भगवान विष्णु की यह आरती कर सकते हैं:
ॐ जय जगदीश हरे
स्वामी जय जगदीश हरे , भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करें।।
जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।
स्वामी जय जगदीश हरे॥
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी॥
स्वामी जय जगदीश हरे॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भरता॥
स्वामी जय जगदीश हरे॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
स्वामी जय जगदीश हरे॥
दीनबन्धु दुखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे।
हाथ उठाओ प्रभु जी, द्वार पड़ा तेरे॥
स्वामी जय जगदीश हरे॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥
स्वामी जय जगदीश हरे॥
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
इसके साथ ही आप माता तुलसी की आरती भी कर सकते हैं:
तुलसी महारानी नमो-नमो
महारानी नमो-नमो, हरि की पटरानी नमो-नमो॥
धन्य हो तुलसी महारानी, तुम हो सब की हितकारी।
करो कृपा हम पर, हे माता, दूर करो सब हमारी बीमारी॥
तुलसी महारानी नमो-नमो, हरि की पटरानी नमो-नमो॥
तुम हो विष्णु प्रिया, तुम हो लक्ष्मी स्वरूपा।
दूर करो सब पाप हमारे, हे माता, भरो हमारा जीवन सुखा॥
तुलसी महारानी नमो-नमो, हरि की पटरानी नमो-नमो॥
तुम हो सबकी रक्षा करने वाली, तुम हो सबकी पालनहारी।
करो कृपा हम पर, हे माता, दूर करो सब हमारी चिंता भारी॥
तुलसी महारानी नमो-नमो, हरि की पटरानी नमो-नमो॥
इन आरतियों के साथ आप भगवान विष्णु और माता तुलसी के मंत्रों का जाप भी कर सकते हैं।
8.देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत में क्या खाना चाहिए ➡️
इसके बारे में यहां जानकारी दी गई है:-
देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत में कुछ चीजों का ध्यान रखना चाहिए। इस दिन चावल खाने की मनाही होती है। इस व्रत में फल, आलू, शकरकंद, दूध जैसे सात्विक चीजों का सेवन किया जाता है।
देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत में खाएं ये चीजें:
1. फल: केला, आम, अंगूर आदि।
2. सूखे मेवे: बादाम, पिस्ता आदि।
3. सभी प्रकार के फल, चीनी, कुट्टू, आलू, साबूदाना, शकरकंद, जैतून, नारियल, दूध, बादाम, अदरक, काली मिर्च, सेंधा नमक आदि का सेवन किया जा सकता है।
9. देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए ➡️
देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत के दिन तामसिक चीजों का सेवन न करें।
1. इस दिन किसी से अभद्र भाषा का इस्तेमाल न करें।
2. इस दिन चावल भूलकर भी नहीं खाने चाहिए।
* इस दिन तुलसी के पत्ते को न तोड़ें, क्योंकि मां तुलसी एकादशी व्रत रखती हैं।
3. एकादशी व्रत के दौरान तुलसी के पत्ते तोड़ने से व्रत खंडित हो जाता है।
यहां कुछ और सुझाव दिए गए हैं:-
1. आप अपनी शारीरिक क्षमतानुसार जल, फलाहार या निर्जला व्रत रख सकते हैं।
2. व्रत के दौरान सुथनी खाने का विशेष धार्मिक महत्व है।
3. आप इसे उबालकर या ऐसे भी खा सकते हैं।
4. व्रत में सुथनी खाए जाने को लेकर एक अन्य धार्मिक महत्व यह भी है कि व्रत के दौरान पूरी तरह से शुद्ध और सात्विक आहार ही लेना चाहिए। सुथनी के सेवन से शरीर में तामसिक गुण नहीं बढ़ता और इसलिए यह व्रत के लिए अनुरूप माना जाता है।
10. देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत रखने के क्या लाभ है ➡️
देव प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने से कई लाभ होते हैं। इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है। पद्मपुराण के अनुसार, जो व्यक्ति इस व्रत को करता है, उसे एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञों के बराबर फल मिलता है।
इस व्रत को करने से मनुष्य के पितरों को भी लाभ मिलता है और वे नरक के दुखों से छुटकारा पाकर श्रीहरि के धाम में स्थान प्राप्त करते हैं। इसके अलावा, इस व्रत को करने से सभी तीर्थों में स्नान करने और पृथ्वी दान करने के बराबर फल मिलता है।
देव प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के जीवन में सुख-समृद्धि और शांति आती है। इस व्रत को करने से मनुष्य के मन में सकारात्मक विचारों का संचार होता है और वह भगवान के प्रति अधिक समर्पित होता है।
यह व्रत मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति की ओर ले जाता है और उसे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाता है। इसलिए, जो व्यक्ति देव प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करता है, वह वास्तव में बहुत भाग्यशाली होता है।
11. देव प्रबोधिनी एकादशी व्रतों का उद्यापन कैसे करें ➡️
1.उद्यापन विधि:-
1. देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2.भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएं।
3. भगवान विष्णु को पीले फूल, फल, मिठाई और तुलसी दल अर्पित करें।
4. भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें और कथा सुनें।
5.व्रत का पारण द्वादशी तिथि में करें।
6. ब्रह्राणों को भोजन कराएं और दान दक्षिणा दें।
2.महत्व:-
1. देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत का उद्यापन करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
2. इस दिन भगवान विष्णु चार महीने के विश्राम के बाद जागते हैं।
3. इस दिन तुलसी विवाह भी किया जाता है।
3.विशेष:-
1. यदि आप चतुर्मास व्रत कर रहे हैं, तो आपको इस दिन विशेष रूप से उद्यापन करना चाहिए।
2. आप अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार उद्यापन कर सकते हैं।
3.कुछ अतिरिक्त सुझाव:-
1. आप उद्यापन के दिन गरीबों को भोजन और वस्त्र दान कर सकते हैं।
2. आप किसी मंदिर में जाकर भगवान विष्णु की पूजा अर्चना कर सकते हैं।
3. आप एकादशी व्रत कथा का पाठ कर सकते हैं
नोट इस लेख में निहित किसी भी जानकारी , सामग्री की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों ,ज्योतिषियों ,पंचांग ,प्रवचनों ,मान्यताओं ,धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी। ✍️ मंजीत सनसनवाल 🤔