https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1494766442523857 जतीन्द्रनाथ दास का जीवन परिचय

जतीन्द्रनाथ दास का जीवन परिचय

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 जतीन्द्रनाथ दास का जीवन परिचय 




जतीन्द्रनाथ दास का जीवन परिचय






 

जन्म:-


27 अक्टूबर, 1904, कलकत्ता, ब्रिटिश भारत


मृत्यु:-


13 सितम्बर, 1929, लाहौर, पाकिस्तान


 उपलब्धियां :-


1. 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंके, वे जतीन्द्रनाथ दास के द्वारा बनाये हुए थे। जतीन्द्रनाथ दास भारत के प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों में से एक थे, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए जेल में अपने प्राण त्याग दिए और शहादत पाई। इन्हें जतिन दास के नाम से भी जाना जाता है, जबकि संगी साथी इन्हें प्यार से जतिन दा कहा करते थे। जतीन्द्रनाथ दास कांग्रेस सेवादल में सुभाषचन्द्र बोस के सहायक थे। 



2.भगत सिंह से भेंट होने के बाद ये बम बनाने के लिए आगरा आ गये थे। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंके थे, वे इन्हीं के द्वारा बनाये गए थे। जेल में क्रान्तिकारियों के साथ राजबन्दियों  के समान व्यवहार न होने के कारण क्रान्तिकारियों ने 13 जुलाई, 1929 से अनशन आरम्भ कर दिया। जतीन्द्रनाथ भी इसमें सम्मिलित हुए। अनशन के 63 वें दिन जेल में ही इनका देहान्त हो गया।क्रांतिकारी गतिविधि:जब जतीन्द्रनाथ अपनी आगे की शिक्षा पूर्ण कर रहे थे, तभी महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ किया। जतीन्द्रनाथ इस आन्दोलन में कूद पड़े। विदेशी कपड़ों की दुकान पर धरना देते हुए वे गिरफ़्तार कर लिये गए। 



3. उन्हें 6 महीने की सज़ा हुई। लेकिन जब चौरी-चौरा की घटना के बाद गाँधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो निराश जतीन्द्रनाथ फिर कॉलेज में भर्ती हो गए। कॉलेज का यह प्रवेश जतीन्द्र के जीवन में निर्णायक सिद्ध हुआ।लाहौर षड़यंत्र केस में गिरफ़्तार:जेल से बाहर आने पर जतीन्द्रनाथ दास ने अपना अध्ययन और राजनीति दोनों काम जारी रखे


4. 1928 की कोलकाता कांग्रेस में वे कांग्रेस सेवादल में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के सहायक थे। वहीं उनकी सरदार भगत सिंह से भेंट हुई और उनके अनुरोध पर बम बनाने के लिए आगरा आए। 8 अप्रैल 1929 को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंक , वे इन्हीं के द्वारा बनायें हुए थे। 14 जून , 1929 को जतीन्द्रनाथ दास गिरफ्तार कर लिये गए और उन पर लाहौर षड्यंत्र केस में मुकदमा चला।


5. जेल में क्रांतिकारियों के साथ राज बन्दियों के समाने व्यवहार न होने के कारण क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई , 1929 से अनशन आरंभ कर दिया। जतीन्द्रनाथ दास भी इसमें सम्मिलित हुए। उनका कहना था कि एक बार अनशन आरम्भ होने पर हम अपनी मांगों की पूर्ति के बिना उसे नहीं तोड़ेंगे। कुछ समय के बाद जेल अधिकारियों ने नाक में नली डालकर बलपूर्वक अनशन पर बैठे क्रांतिकारियों के के पेट में दूध डालना शुरू कर दिया। जतीन्द्रनाथ को 21 दिन के पहले अपने अनशन का अनुभव था। उनके साथ यह युक्ति काम नहीं आई। नाक से डाली नली को सांस से खींचकर वे दांतों से दबा लेते थे। अन्त में पागल खाने के एक डॉक्टर ने एक नाक की नली दांतों से दब जाने पर दूसरी नाक से नली डाल दी, जो जतीन्द्रनाथ के फेफड़ों में चली गई।



6. उनकी घुटती सांस की परवाह किए बिना उस डॉक्टर ने एक सेर दूध उनके फेफड़ों में भर दिया। इससे उन्हें निमोनिया हो गया। कर्मचारियों ने उन्हें धोखे से बाहर ले जाना चाहा, लेकिन जतीन्द्र अपने साथियों से अलग होने के लिए तैयार नहीं हुए।निधन:अनशन के 63वें दिन 13 सितम्बर, 1929 को जतीन्द्रनाथ दास का देहान्त हो गया। जतीन्द्र के भाई किरण चंद्रदास ट्रेन से उनके शव को कोलकाता ले गए। सभी स्टेशनों पर लोगों ने इस शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की। कोलकाता में शवदाह के समय लाखों की भीड़ एकत्र थी। उनकी इस शानदार अहिंसात्मक शहादत का उल्लेख पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में किया है।


                          ✍️      मंजीत सनसनवाल 🤔 



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